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US-Iran War Impact on Pakistan: तेल संकट से जूझ रहा पाकिस्तान, जंग ने बिगाड़ी अर्थव्यवस्था

April 30, 2026

US-Iran War Impact on Pakistan: तेल संकट से जूझ रहा पाकिस्तान, जंग ने बिगाड़ी अर्थव्यवस्था
अमेरिका और ईरान के बीच जारी तनाव ने पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था पर गंभीर प्रभाव डाला है। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री Shehbaz Sharif ने स्वीकार किया है कि हालिया संघर्ष ने देश की आर्थिक स्थिति को अस्थिर कर दिया है। उन्होंने चेतावनी दी कि पिछले दो वर्षों में हासिल की गई आर्थिक प्रगति अब खतरे में है, क्योंकि वैश्विक ईंधन कीमतों में तेज वृद्धि और क्षेत्रीय अस्थिरता का सीधा असर देश पर पड़ रहा है। संघर्ष से पहले पाकिस्तान का साप्ताहिक तेल आयात बिल लगभग 300 मिलियन डॉलर था, जो अब बढ़कर 800 मिलियन डॉलर तक पहुंच गया है। यह भारी वृद्धि देश के विदेशी मुद्रा भंडार और समग्र आर्थिक संतुलन पर दबाव डाल रही है। इस संकट से निपटने के लिए सरकार ने एक विशेष टास्क फोर्स का गठन किया है, जो रोज़ाना स्थिति की निगरानी कर रहा है और संभावित समाधान तलाश रहा है। पाकिस्तान ने इस तनाव को कम करने के लिए कूटनीतिक प्रयास भी किए। Shehbaz Sharif के अनुसार, 11 अप्रैल से इस्लामाबाद में अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत करवाई गई, जो लगभग 21 घंटे तक चली। हालांकि फिलहाल एक अस्थायी संघर्ष-विराम लागू है, लेकिन स्थायी समाधान अभी दूर दिखाई देता है। इन प्रयासों में सेना प्रमुख Asim Munir और विदेश मंत्री Ishaq Dar की भूमिका की भी सराहना की गई। इस संघर्ष का वैश्विक ऊर्जा बाजार पर भी बड़ा असर पड़ा है। नौसैनिक नाकाबंदी के चलते तेल आपूर्ति बाधित हुई है, जिससे ब्रेंट क्रूड की कीमत लगभग 7.6% बढ़कर 119.69 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई—जो पिछले चार वर्षों का उच्चतम स्तर है। इस स्थिति ने वैश्विक स्तर पर मुद्रास्फीति का दबाव और बढ़ा दिया है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी इसके गंभीर परिणामों की आशंका जताई जा रही है। United Nations Development Programme (UNDP) ने चेतावनी दी है कि इस संघर्ष और बढ़ती महंगाई के कारण 160 देशों में 3 करोड़ से अधिक लोग गरीबी के जाल में फंस सकते हैं। इस स्थिति को “विकास का उल्टा रुख” बताया गया है, जहां आर्थिक प्रगति धीमी पड़ने के बजाय पीछे जा सकती है। कुल मिलाकर, यह संघर्ष सिर्फ क्षेत्रीय नहीं बल्कि वैश्विक आर्थिक संकट का संकेत दे रहा है, जिसमें पाकिस्तान जैसे आयात-निर्भर देशों को सबसे अधिक नुकसान उठाना पड़ रहा है।