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विवाद के बाद यू-टर्न: सीएम ने अपने ज्योतिषी को OSD से हटाया

May 13, 2026 Source: Public-Axis

विवाद के बाद यू-टर्न: सीएम ने अपने ज्योतिषी को OSD से हटाया
तमिलनाडु की राजनीति में एक दिलचस्प और विवादास्पद घटना सामने आई है, जिसमें मुख्यमंत्री विजय द्वारा अपने निजी ज्योतिषी पंडित रिकी राधा वेत्रीवेल को मुख्यमंत्री कार्यालय में ओएसडी (Officer on Special Duty) के पद पर नियुक्त करने का फैसला सिर्फ 24 घंटे के भीतर वापस ले लिया गया। रिपोर्ट के अनुसार, मुख्यमंत्री विजय ने मंगलवार को पंडित रिकी राधा वेत्रीवेल को OSD के पद पर नियुक्त किया था। यह नियुक्ति सामने आते ही राजनीतिक हलकों में तीखी प्रतिक्रिया शुरू हो गई। लेकिन हैरानी की बात यह रही कि महज एक दिन के भीतर ही सरकार ने इस फैसले को पलट दिया और प्रधान सचिव की ओर से जारी पत्र में उनकी नियुक्ति को रद्द कर दिया गया। यह फैसला ऐसे समय में लिया गया जब तमिलनाडु विधानसभा में फ्लोर टेस्ट हुआ था और सरकार ने उसे सफलतापूर्वक पास कर लिया था। बताया जा रहा है कि फ्लोर टेस्ट के कुछ ही घंटों बाद यह बड़ा प्रशासनिक निर्णय सामने आया। इस विवाद की शुरुआत तब हुई जब मुख्यमंत्री के इस कदम की आलोचना उनके ही सहयोगी दलों और विपक्षी नेताओं ने शुरू कर दी। VCK नेता थोल. तिरुमावलवन ने सबसे पहले इस नियुक्ति पर सवाल उठाए। इसके बाद DMDK की नेता प्रेमलता और DMK नेता उदयनिधि स्टालिन ने भी सरकार की आलोचना करते हुए कहा कि सरकारी पदों पर नियुक्ति योग्यता और नियमों के आधार पर होनी चाहिए, न कि व्यक्तिगत पसंद या संबंधों के आधार पर। मामला केवल राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इस फैसले को मद्रास हाई कोर्ट में भी चुनौती दी गई। इसके बाद सोशल मीडिया पर भी इस मुद्दे को लेकर व्यापक बहस शुरू हो गई और सरकार पर अंधविश्वास को बढ़ावा देने के आरोप लगाए जाने लगे। फ्लोर टेस्ट के दौरान भी यह मुद्दा उठाया गया। सरकार की ओर से मंत्री निर्मल कुमार ने सफाई देते हुए कहा कि पंडित रिकी राधा वेत्रीवेल पहले पार्टी प्रवक्ता रह चुके हैं और उनकी नियुक्ति प्रशासनिक आधार पर की गई थी। उन्होंने यह भी कहा कि उनका ज्योतिषी होना उनका व्यक्तिगत मामला है। वहीं, लेफ्ट पार्टियों CPI और CPIM ने भी इस नियुक्ति का विरोध किया और कहा कि सरकारी पदों पर वैज्ञानिक सोच को प्राथमिकता मिलनी चाहिए। उनका तर्क था कि सरकारी खर्च पर किसी ज्योतिषी की नियुक्ति अंधविश्वास को बढ़ावा देती है। अंततः बढ़ते राजनीतिक दबाव, कानूनी चुनौती और सार्वजनिक आलोचना के बाद सरकार को यह नियुक्ति वापस लेनी पड़ी। यह पूरा घटनाक्रम तमिलनाडु की राजनीति में एक बड़ी बहस छोड़ गया है कि सरकारी पदों पर नियुक्तियों में पारदर्शिता और योग्यता कितनी महत्वपूर्ण है।